अजंता भित्तिचित्र कार्यशाला : परंपरा और सृजनशीलता का संगम)
अजंता भित्तिचित्र कार्यशाला : परंपरा और सृजनशीलता का संगम
“कला बच्चों की कल्पनाशक्ति, संवेदनशीलता और आत्मविश्वास को बढ़ाती है”
लखनऊ, 4 सितम्बर 2025, भारतीय कला परंपरा अपने वैभव, प्रतीकात्मकता और अध्यात्मिक गहराई के लिए विश्वभर में विख्यात रही है। इनमें अजंता की भित्तिचित्र श्रृंखला विशेष स्थान रखती है, जिसने न केवल भारतीय सौंदर्यशास्त्र को समृद्ध किया बल्कि वैश्विक कला इतिहास में भी अपना अमिट स्थान बनाया। इसी कालजयी परंपरा को विद्यार्थियों तक पहुँचाने के उद्देश्य से लखनऊ पब्लिक स्कूल्स एंड कॉलेजेज ने सौंदर्य एवं सांस्कृतिक विकास कार्यक्रम – 2025–26 के अंतर्गत फ्लोरेसेंस आर्ट गैलरी, लखनऊ के सहयोग से लखनऊ पब्लिक वर्ल्ड स्कूल परिसर में छ दिवसीय अजंता भित्तिचित्र पेंटिंग कार्यशाला का आयोजन किया गया था। जिसका समापन गुरुवार को विद्यालय प्रांगण में एक प्रदर्शनी लगा कर किया गया। साथ ही सभी प्रतिभागियों को मुख्य अतिथि द्वारा प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया गया।
ज्ञातव्य हो कि इस कार्यशाला की शुरुआत 28 अगस्त 2025 को लखनऊ पब्लिक वर्ल्ड स्कूल परिसर में किया गया था। समापन अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में लेखक, कला समीक्षक अलोक पराड़कर रहे। उन्होंने अपने वक्तव्य में विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि आज इस अवसर पर उपस्थित होकर मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा है। मैं सबसे पहले आयोजकों को धन्यवाद देना चाहूँगा कि उन्होंने हमें बच्चों की कला प्रतिभा को देखने और उन्हें प्रोत्साहित करने का यह सुनहरा अवसर दिया। उन्होंने आगे कहा कि कला केवल रंगों और रेखाओं का खेल नहीं है। यह हमारी कल्पनाशक्ति को उड़ान देती है, हमारे मन की भावनाओं को अभिव्यक्ति देती है और हमें अपनी संस्कृति और परंपरा से जोड़ती है। जब आप चित्र बनाते हैं, रंग भरते हैं या कोई रचना गढ़ते हैं, तब आप अपने व्यक्तित्व का निर्माण कर रहे होते हैं। मेरा आप सभी से निवेदन है कि आप बच्चों को कला के प्रति प्रोत्साहित करें और उन्हें अपने रूचि के अनुसार अपने भविष्य को आकार देने के लिए स्वतंत्र रखे। जीवन में सफलता पाने का सबसे बड़ा मंत्र है – अपनी रुचि के अनुसार कार्य करना। जब हम रुचि से कोई काम करते हैं, तो वह बोझ नहीं, बल्कि आनंद बन जाता है। कला के क्षेत्र में तो रुचि और भी आवश्यक है, क्योंकि बिना रुचि के कोई भी चित्र, रंग या रचना जीवंत नहीं हो सकती। कला बच्चों की कल्पनाशक्ति, संवेदनशीलता और आत्मविश्वास को बढ़ाती है। बच्चों के हर छोटे प्रयासो की सराहना अवश्य करें। उनकी बनाई हुई रचनाओं को महत्व दें। यही प्रोत्साहन उनके आत्मविश्वास को बढ़ाएगा और उन्हें एक बेहतर इंसान भी बनाएगा।
इस कार्यशाला की संकल्पना श्रीमती नेहा सिंह (निदेशक – एकेडमिक एवं इनोवेशन, लखनऊ पब्लिक स्कूल्स एंड कॉलेजेज तथा निदेशक, फ्लोरेसेंस आर्ट गैलरी) ने की। उनका मानना है कि युवाओं में कलात्मक संवेदनशीलता विकसित करना केवल रचनात्मकता का विकास नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है। कार्यशाला का उद्देश्य छात्रों को अजंता कला की दार्शनिकता से जोड़ना, अनुशासन और कल्पनाशीलता का विकास करना तथा उनकी संरचनात्मक और बारीक़ी समझ को गहराई देना है।
इस अवसर पर फ्लोरेसेंस आर्ट गैलरी के क्यूरेटर भूपेंद्र अस्थाना ने इस कार्यशाला को छात्रों के लिए “अजंता की दृश्य-समृद्धि से जुड़ने और सांस्कृतिक धरोहर को समझने का जीवंत मंच” बताया। वास्तव में यह कार्यशाला छात्रों को केवल तकनीकी कौशल ही नहीं, बल्कि धारणा (philosophy) और सांस्कृतिक चेतना से भी संपन्न करती है। यह कार्यशाला अतीत की परंपरा और वर्तमान की सृजनशीलता का संगम है। लखनऊ पब्लिक स्कूल्स एंड कॉलेजेज की यह पहल स्पष्ट करती है कि शिक्षा केवल अकादमिक ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें सांस्कृतिक धरोहर, सौंदर्यबोध और रचनात्मक दृष्टि का समावेश होना भी उतना ही आवश्यक है। इस तरह की पहलें नई पीढ़ी को भारतीय कला की गहराई से जोड़ते हुए उन्हें भविष्य का संवेदनशील और सृजनशील नागरिक बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम हैं। यह कार्यशाला केवल तकनीकी अभ्यास तक सीमित नहीं रही, बल्कि छात्रों को भारतीय कला की गहराई, उसकी दार्शनिकता और रचनात्मक संभावनाओं से भी परिचित कराती है। यह पहल एक सेतु का कार्य करती है—जहाँ एक ओर छात्र अतीत की सांस्कृतिक जड़ों को समझते हैं, वहीं दूसरी ओर वे अपनी कल्पनाशक्ति को नए आयाम देने की ओर प्रेरित होते हैं। इस प्रकार, यह कार्यशाला भविष्य की उस संवेदनशील पीढ़ी को तैयार करने का प्रयास है, जो न केवल कला में दक्ष होगी, बल्कि अपने सांस्कृतिक मूल्यों से भी गहराई से जुड़ी रहेगी।
विद्यालय की प्राचार्या श्रीमती नवनीत कौर ने कहा कि कला केवल चित्रांकन की विधा ही नहीं है, बल्कि यह छात्रों के मानसिक अनुशासन, सांस्कृतिक आधार और कल्पनाशीलता को दिशा देने का माध्यम भी है।
कला विभागाध्यक्ष श्री राजेश कुमार ने इसे छात्रों की जिज्ञासा को कलात्मक अभिव्यक्ति में बदलने की सार्थक पहल बताया। इस छह दिवसीय कार्यशाला में कक्षा 5 से 10 तक के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। इस कार्यशाला में विषय विशेषज्ञ के रूप में श्रीमती अंशु सक्सेना (कला शिक्षिका, लखनऊ पब्लिक वर्ल्ड स्कूल) थीं। जिनके मार्गदर्शन में इस छात्र अजंता भित्तिचित्रों की विशिष्टताओं जैसे – छत की डिज़ाइन संरचनाएँ, भित्तिचित्र रूपांकन, कथात्मक शैली और प्रतीकात्मक भावभूमि – से व्यावहारिक रूप से परिचित हुए।
– भूपेंद्र कुमार अस्थाना