ग्रामीण भारत की महिलाओं में आत्मनिर्भरता की जो लहर उठ रही है, उसका एक प्रेरणादायक उदाहरण



औ जौनपुर के ब्लॉक बक्शा के ग्राम सभा नरी का “जन कल्याण आजीविका स्वयं सहायता समूह” बनकर उभरा है। साधना खरवार के नेतृत्व में 13 महिलाओं का यह छोटा-सा समूह आज अपनी मेहनत और सामूहिक प्रयास से बड़ी सफलता की कहानी लिख रहा है। उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन उनके लिए वरदान साबित हुआ।
➡️उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 से पहले उनका जीवन बहुत कठिन था। वह और उनके पति दोनों बी.ए. एम. ए. बीएड हैं। पति गृहस्थी का कार्य करते थे। उनका बच्चा दिव्यांग है। उसकी देखभाल, गरीबी और संसाधनों के अभाव में जीवन संघर्षों से भरा था। पढ़े-लिखे होने के बावजूद समस्याएं खत्म नहीं होती थीं। 2018 में उन्होंने फैसला किया कि हालात बदलने हैं। उन्होंने स्वयं राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, समस्तीपुर, बिहार जाकर मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लिया। वापस आकर कृषि विज्ञान केंद्र, बक्सा में भी प्रशिक्षण प्राप्त किया और कृषि विज्ञान केंद्र बक्सा, उद्यान विभाग और कृषि विभाग, जौनपुर का समय-समय पर भरपूर तकनीकी सहयोग मिलता रहा है। जिला प्रशासन जौनपुर और उत्तर प्रदेश शासन का मार्गदर्शन भी हमेशा साथ रहा है।
➡️आज वह ब्लॉक बक्सा की 25 ग्राम सभा का नेतृत्व कर रही है। समूह में कोई दीदी बकरी पालन करती है, कोई मशरूम उत्पादन, कोई मुर्गी-मछली पालन तो कोई सिलाई-कढ़ाई बुनाई का कार्य। हर दीदी अपने पैरों पर खड़ी हो रही है। छोटे शेड से बड़े सपनों की उड़ान- शुरुआत में सीमित संसाधनों के बावजूद समूह ने हिम्मत नहीं हारी। लगभग 60 हजार रुपये की लागत से 14×51 फीट का एक मशरूम शेड तैयार किया गया। यही छोटा सा ढांचा आज उनके बड़े सपनों की मजबूत नींव बन गया है।
➡️मशरूम उत्पादन में विविधता और नवाचार- समूह ने केवल एक प्रकार के मशरूम तक खुद को सीमित नहीं रखा। बटन, ऑयस्टरयू और मिल्की मशरूम जैसी विभिन्न प्रजातियों का उत्पादन कर उन्होंने बाजार की मांग को समझा। इसके साथ ही उन्होंने वैल्यू एडिशन पर भी जोर दिया। मशरूम अचार, कोहरौरी, पाउडर, सूखा और ताजा मशरूम जैसे उत्पाद तैयार कर स्थानीय बाजार में अपनी अलग पहचान बनाई।
➡️हर महीने हजारों की आमदनी- मौसम के अनुसार उत्पादन करते हुए समूह हर महीने औसतन 1.5 क्विंटल तक मशरूम तैयार करता है। 150 से 250 रुपये प्रति किलो की दर से बिक्री कर उन्हें हर महीने 20 से 25 हजार रुपये तक की आय हो रही है। सालाना यह आमदनी करीब 2.5 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है। चुनौतियों से सीखकर बनी ताकत- शुरुआती दौर में तापमान नियंत्रण, मार्केटिंग और तकनीकी जानकारी की कमी जैसी कई समस्याएं सामने आईं। लेकिन समूह ने प्रशिक्षण लेकर और आपसी सहयोग से इन सभी चुनौतियों को अवसर में बदल दिया।
➡️सिर्फ खुद नहीं, दूसरों को भी बना रहीं आत्मनिर्भर- समूह की अध्यक्ष साधना खरवार के नेतृत्व में यह पहल अब एक मिशन बन चुकी है। समूह न केवल खुद उत्पादन कर रहा है, बल्कि अन्य ब्लॉकों की महिलाओं को भी निःशुल्क प्रशिक्षण दे रहा है। अब तक लगभग 250 स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं और 200 से अधिक युवा किसानों को मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण दिया जा चुका है।
➡️प्रेरणा बनता जा रहा यह प्रयास- इस समूह की सफलता से गांव की अन्य महिलाएं भी प्रेरित हो रही हैं और स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं। यह पहल दिखाती है कि यदि सही दिशा, सामूहिक प्रयास और मजबूत इच्छाशक्ति हो, तो सीमित संसाधनों में भी बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है।
➡️“जन कल्याण आजीविका स्वयं सहायता समूह” आज आत्मनिर्भर भारत की सोच को जमीन पर उतारते हुए यह संदेश दे रहा है कि छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। यह कहानी सिर्फ 13 महिलाओं की नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण समाज के बदलते आत्मविश्वास की कहानी है।
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