जुआ मामले में पुलिस जांच पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, कहा- मजिस्ट्रेट की अनुमति जरूरी


Allahabad High Court ने सार्वजनिक स्थान पर जुआ खेलने से जुड़े मामलों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि Public Gambling Act, 1867 की धारा 13 के तहत दर्ज अपराध गैर-संज्ञेय (Non-Cognizable) है। ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना पुलिस न तो जांच शुरू कर सकती है और न ही बिना वारंट गिरफ्तारी कर सकती है।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति Sanjay Kumar Pachori की एकलपीठ ने एक आरोपी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही और समन आदेश को रद्द करते हुए की।
मामला मिर्जापुर का था, जहां पुलिस ने चार लोगों को ताश के पत्तों और नकदी के साथ पकड़ने के बाद Public Gambling Act की धारा 13 के तहत एफआईआर दर्ज की थी। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की, जिस पर मजिस्ट्रेट ने संज्ञान ले लिया था।
आरोपी पक्ष की ओर से अधिवक्ता श्रेय सिंह और रागिनी गुप्ता ने दलील दी कि उत्तर प्रदेश संशोधन अधिनियम, 1961 के तहत धारा 13 में अधिकतम सजा छह महीने निर्धारित है। ऐसे में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की पहली अनुसूची के अनुसार यह अपराध गैर-संज्ञेय माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि CrPC की धारा 155(2) के तहत गैर-संज्ञेय अपराधों की जांच मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति के बिना नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई स्पष्ट साक्ष्य नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि कथित जुआ सार्वजनिक स्थान पर खेला जा रहा था।
कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि तथ्यों और कानून पर पर्याप्त विचार किए बिना संज्ञान आदेश पारित कर दिया गया।
हालांकि, अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि पिछले वर्ष हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ ने इसी धारा 13 के अपराध को संज्ञेय माना था, क्योंकि कानून में पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी की शक्ति प्रदान की गई है।

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