सरकारी वकील को ‘अनपढ़’ कहना पड़ा भारी, हाईकोर्ट ने आजमगढ़ के एसएसपी के पीआरओ को कोर्ट कस्टडी में भेजा सरकारी अधिवक्ता से दुर्व्यवहार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, शाम पांच बजे तक हिरासत में रखने का आदेश; डीजीपी को पुलिसकर्मियों के लिए सर्कुलर जारी करने का निर्देश

प्रयागराज/आजमगढ़। सरकारी अधिवक्ता से फोन पर कथित दुर्व्यवहार और उन्हें ‘अनपढ़’ कहने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने आजमगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) के जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) राजेश कुमार सिंह को सोमवार को शाम पांच बजे तक अदालत की हिरासत में रखने का आदेश दिया। बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया।
क्या है पूरा मामला?
मामला आजमगढ़ के महाराजगंज थाने से जुड़े एक प्रकरण में आरोपी सचिन यादव की जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। अदालत ने पहले मामले के विवेचक विनय कुमार मिश्रा के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया था। बाद में विवेचक ने अदालत में उपस्थित होकर बताया कि उन्हें वारंट की जानकारी नहीं थी। उनका स्पष्टीकरण स्वीकार करते हुए अदालत ने वारंट वापस ले लिया।
सुनवाई के दौरान सहायक सरकारी अधिवक्ता (एजीए) अनुराग पांडेय ने अदालत को बताया कि न्यायिक आदेश के अनुपालन के संबंध में फोन पर बातचीत के दौरान एसएसपी के पीआरओ ने उन्हें कथित तौर पर ‘अनपढ़’ कहा। इस पर अदालत ने नाराजगी जताई और पुलिस अधिकारी के आचरण पर कड़ी टिप्पणी की।
सरकारी अधिवक्ताओं से दुर्व्यवहार पर हाईकोर्ट सख्त
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी अधिवक्ता जब न्यायालय के आदेशों के अनुपालन के लिए अधिकारियों को सूचित करते हैं, तो वे अदालत के निर्देशों के पालन में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे होते हैं। ऐसे में उनके साथ दुर्व्यवहार को गंभीरता से लिया जाएगा।
अदालत ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्देश दिया कि वह पुलिस अधिकारियों के लिए सर्कुलर जारी करें। इसमें स्पष्ट किया जाए कि न्यायिक आदेशों के अनुपालन के संबंध में सरकारी अधिवक्ताओं से दुर्व्यवहार करने पर अदालत की अवमानना सहित कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है।
पीआरओ पद से हटाए गए अधिकारी
सुनवाई के दौरान एसएसपी डॉ. अनिल कुमार ने अदालत को बताया कि संबंधित पीआरओ को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है और उन्हें पीआरओ के पद से हटा दिया गया है। अदालत ने एसएसपी की कार्रवाई पर संतोष जताते हुए उनके संबंध में मामला समाप्त कर दिया तथा भविष्य में अधिक सावधानी बरतने की अपेक्षा व्यक्त की।
न्यायालय की इस कार्रवाई से स्पष्ट संदेश गया है कि न्यायिक आदेशों के अनुपालन में लगे सरकारी अधिवक्ताओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना अधिकारियों की जिम्मेदारी है।