अब रात में भी मिलेगी सूरज की रोशनी! अमेरिकी कंपनी के मिशन में भारत के विक्रम रॉकेट की होगी अहम भूमिका अंतरिक्ष में बड़े शीशे वाले सैटेलाइट भेजकर धरती पर रोशनी पहुंचाने की तैयारी, आपदा राहत से लेकर सौर ऊर्जा उत्पादन तक में इस्तेमाल की संभावना

नई दिल्ली। कल्पना कीजिए कि रात के अंधेरे में भी किसी खास इलाके में सूरज की रोशनी पहुंचाई जा सके। विज्ञान की दुनिया में इसी कल्पना को हकीकत में बदलने की दिशा में एक अमेरिकी कंपनी काम कर रही है। कैलिफोर्निया की कंपनी रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल अंतरिक्ष में ऐसे उपग्रह भेजने की योजना बना रही है, जिन पर लगे बड़े परावर्तक शीशों की मदद से सूर्य की रोशनी को धरती के चुनिंदा हिस्सों की ओर मोड़ा जा सकेगा। इस महत्वाकांक्षी योजना में भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र की कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस के रॉकेट की भी भूमिका हो सकती है।
कंपनी की योजना के अनुसार, अंतरिक्ष में तैनात उपग्रह सूर्य की रोशनी को परावर्तित करके रात के समय धरती के किसी निर्धारित क्षेत्र तक पहुंचाएंगे। हालांकि, यह तकनीक अभी विकास और परीक्षण के चरण में है। इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने से पहले इसकी व्यवहारिकता और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करना जरूरी होगा।
स्काईरूट के विक्रम रॉकेट से होंगे दो प्रक्षेपण
रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल ने हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस के साथ दो उपग्रह प्रक्षेपणों को लेकर समझौता किया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, पहला प्रक्षेपण विक्रम-1 रॉकेट से और दूसरा प्रस्तावित विक्रम-1U रॉकेट से किया जाना है। विक्रम-1U के डिजाइन में अतिरिक्त बूस्टर के जरिए प्रक्षेपण क्षमता बढ़ाने की योजना बताई गई है।
इस साझेदारी का उद्देश्य उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए वैकल्पिक प्रक्षेपण सुविधा उपलब्ध कराना है। स्काईरूट के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी पवन चंदाना ने इस सहयोग को अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोलने वाला कदम बताया है। वहीं, रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बेन नोवैक ने भी नए प्रक्षेपण साझेदार के साथ काम करने को लेकर उत्साह जताया है।
पांच किलोमीटर तक के क्षेत्र में रोशनी पहुंचाने की योजना
कंपनी की परिकल्पना के मुताबिक, अंतरिक्ष में लगे परावर्तक शीशों की मदद से लगभग पांच किलोमीटर चौड़े क्षेत्र में रोशनी पहुंचाई जा सकती है। जरूरत के अनुसार रोशनी की तीव्रता को नियंत्रित करने और निर्धारित समय पर इसे बंद करने की भी योजना है।
कंपनी इस तकनीक के कई संभावित उपयोग गिना रही है। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत और बचाव अभियान चलाने, दूरदराज के औद्योगिक क्षेत्रों में कामकाज जारी रखने और कुछ परिस्थितियों में सौर ऊर्जा संयंत्रों के उपयोग की अवधि बढ़ाने में इससे मदद मिलने की संभावना जताई जा रही है।
हालांकि, सौर ऊर्जा उत्पादन में इसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि परावर्तित रोशनी कितनी प्रभावी होगी और उसे उपलब्ध कराने की लागत कितनी आएगी। इसे सामान्य दिन की धूप का सीधा विकल्प नहीं माना जा सकता।
परीक्षण को मिली मंजूरी, लेकिन कई चुनौतियां बरकरार
रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल ने इस तकनीक के परीक्षण के लिए अमेरिकी नियामक संस्था फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (FCC) से संबंधित अनुमति मिलने की जानकारी दी है। किसी परीक्षण की अनुमति मिलना और तकनीक का नियमित व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू होना दो अलग-अलग चरण हैं। व्यापक उपयोग से पहले उपग्रहों की कार्यक्षमता, सुरक्षा और नियामकीय शर्तों का पालन महत्वपूर्ण होगा।
कंपनी की योजना अंतरिक्ष से सूर्य की रोशनी को चुनिंदा स्थानों तक पहुंचाने की है। लेकिन बादलों, मौसम, उपग्रहों की स्थिति और धरती पर रोशनी के फैलाव जैसे कारक इस तकनीक के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकते हैं।
वन्यजीवों, इंसानों और खगोल विज्ञान पर असर की आशंका
इस तकनीक को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों और खगोल विज्ञान से जुड़े लोगों की चिंताएं भी सामने आई हैं। रात में कृत्रिम रूप से रोशनी बढ़ने से वन्यजीवों की प्राकृतिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। कई जीव भोजन खोजने, प्रजनन और प्रवास के लिए प्राकृतिक अंधेरे पर निर्भर रहते हैं।
इसके अलावा, रात के आकाश में अतिरिक्त प्रकाश बढ़ने से खगोलविदों को दूरस्थ तारों और अन्य खगोलीय पिंडों का अध्ययन करने में कठिनाई हो सकती है। इंसानों की नींद और जैविक घड़ी पर भी अत्यधिक रात की रोशनी का असर पड़ने की आशंका है।
रूस पहले भी कर चुका है ऐसा प्रयोग
अंतरिक्ष से सूर्य की रोशनी धरती तक पहुंचाने का विचार बिल्कुल नया नहीं है। वर्ष 1993 में रूस ने ‘ज्नाम्या’ नामक प्रयोग के तहत अंतरिक्ष में परावर्तक संरचना भेजकर सूर्य की रोशनी को धरती की ओर मोड़ने का प्रयास किया था। इस प्रयोग ने अंतरिक्ष आधारित प्रकाश व्यवस्था की संभावनाओं को प्रदर्शित किया, लेकिन इस विचार को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने में कई व्यावहारिक और आर्थिक चुनौतियां रहीं।
रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल भी अपनी योजना को आगे बढ़ाने से पहले वैज्ञानिकों, स्थानीय समुदायों और नियामक संस्थाओं के साथ काम करने की बात कह रही है।
कुल मिलाकर, अंतरिक्ष से रात में सूर्य की रोशनी पहुंचाने की यह योजना विज्ञान और तकनीक की दुनिया में एक नई संभावना पेश करती है। यदि यह तकनीक सुरक्षित, किफायती और पर्यावरण के अनुकूल साबित होती है, तो भविष्य में आपदा राहत और चुनिंदा औद्योगिक कार्यों में इसका उपयोग हो सकता है। लेकिन फिलहाल इसे स्थापित तकनीक नहीं, बल्कि परीक्षण और विकास की दिशा में बढ़ता एक महत्वाकांक्षी प्रयोग समझना अधिक उचित होगा।