बिजली बिल जमा न होने पर कनेक्शन काटने की सख्ती, किसानों की जमीन पर लगे बिजली के खंभों के मुआवजे का सवाल भी अहम

लखनऊ। बिजली बिल समय पर जमा नहीं करने पर उपभोक्ताओं का कनेक्शन काटने की कार्रवाई आम बात है। वहीं दूसरी ओर किसानों की उस जमीन को लेकर भी लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं, जिस पर बिजली के खंभे, टावर या हाईटेंशन लाइनें गुजर रही हैं। किसानों का तर्क है कि जब बिजली विभाग बकाया बिल को लेकर उपभोक्ताओं से भुगतान की अपेक्षा करता है, तो किसानों की जमीन के उपयोग के बदले उन्हें उचित मुआवजा और अधिकार भी सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
इस मुद्दे को लेकर सामने आई तस्वीर में भी यही सवाल प्रमुखता से उठाया गया है। तस्वीर में लिखा है कि यदि बिजली बिल जमा नहीं होता तो बिजली काट दी जाती है, लेकिन जिन किसानों की जमीन पर वर्षों से बिजली के खंभे लगे हैं, उन्हें मुआवजा और अधिकार क्यों नहीं दिया जाता। यह सवाल खास तौर पर उन किसानों की समस्या को सामने लाता है, जिनकी कृषि भूमि पर विद्युत ढांचा होने के कारण खेती प्रभावित होती है।
बिजली लाइन और टावर से प्रभावित होती है खेती
खेतों में बिजली के टावर या हाईटेंशन लाइन होने से किसानों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। टावर के लिए इस्तेमाल होने वाली जमीन पर खेती प्रभावित होती है, जबकि लाइन के कॉरिडोर में आने वाले हिस्से में भी खेती और भविष्य में जमीन के उपयोग को लेकर कई तरह की सीमाएं रहती हैं।
किसानों की मांग रही है कि उनकी जमीन का उपयोग सार्वजनिक विद्युत व्यवस्था के लिए होने की स्थिति में उन्हें पारदर्शी तरीके से उचित मुआवजा दिया जाए और भुगतान में देरी न हो।
उत्तर प्रदेश में मुआवजा व्यवस्था में बड़ा बदलाव
उत्तर प्रदेश सरकार ने मई 2026 में हाईटेंशन ट्रांसमिशन लाइनों से प्रभावित किसानों के लिए मुआवजा व्यवस्था में बदलाव की घोषणा की। रिपोर्टों के मुताबिक 765, 400, 220 और 132 केवी की हाईटेंशन लाइनों से प्रभावित जमीन के लिए नई व्यवस्था में टावर के नीचे आने वाली जमीन पर जमीन की कीमत का 200 प्रतिशत यानी दोगुना मुआवजा निर्धारित किया गया है। वहीं बिजली लाइन के कॉरिडोर में आने वाली जमीन के लिए 30 प्रतिशत मुआवजे का प्रावधान बताया गया है।
इससे पहले टावर के नीचे आने वाली जमीन के मुआवजे की व्यवस्था अपेक्षाकृत कम थी और लाइन के कॉरिडोर के लिए भी स्थिति स्पष्ट नहीं थी। नई व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को अधिक उचित आर्थिक लाभ देना और बिजली परियोजनाओं से जुड़े विवादों को कम करना बताया गया है।
पुराने मामलों में भी उठ रहे सवाल
सबसे बड़ा सवाल उन किसानों का है जिनके खेतों में बिजली के खंभे या टावर कई वर्षों पहले लगाए जा चुके हैं। ऐसे मामलों में मुआवजा मिला था या नहीं, कितना मिला था और वर्तमान नियम उन पुराने मामलों पर किस सीमा तक लागू होते हैं—यह प्रत्येक मामले के दस्तावेज, परियोजना और लागू नियमों के आधार पर अलग हो सकता है।
इसलिए केवल यह कहना उचित नहीं होगा कि खेत में वर्षों पहले लगा हर बिजली का खंभा अपने आप वर्तमान दर से मुआवजे का पात्र हो जाएगा। किसानों को अपने मामले में संबंधित विद्युत विभाग, राजस्व विभाग और परियोजना के रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति की जानकारी लेनी चाहिए।
किसानों की मांग—बिजली व्यवस्था जरूरी, लेकिन अधिकार भी जरूरी
बिजली ग्रामीण विकास और कृषि दोनों के लिए बेहद जरूरी है। खेतों तक बिजली पहुंचाने के लिए पोल और लाइनें लगाना भी आवश्यक है। लेकिन किसानों का कहना है कि विकास परियोजनाओं का भार केवल उनकी जमीन पर नहीं डाला जाना चाहिए। यदि किसी किसान की निजी भूमि का उपयोग विद्युत ढांचे के लिए किया जा रहा है तो प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और नियमानुसार मुआवजा समय पर मिलना चाहिए।
यही वजह है कि अब बिजली बिल, विद्युत कनेक्शन और किसानों की जमीन पर स्थापित विद्युत ढांचे से जुड़े अधिकारों को एक साथ देखने की मांग तेज हो रही है। किसानों के लिए सवाल केवल मुआवजे का नहीं, बल्कि भूमि के अधिकार, खेती के नुकसान और न्यायपूर्ण व्यवस्था का भी है।
बड़ा सवाल यही—नियम सबके लिए स्पष्ट और न्यायपूर्ण हों
बिजली विभाग की ओर से उपभोक्ताओं से समय पर बिल भुगतान की अपेक्षा की जाती है। इसी तरह किसानों की जमीन पर बिजली के टावर या लाइन लगाने की स्थिति में मुआवजे की प्रक्रिया भी स्पष्ट, पारदर्शी और समयबद्ध होनी चाहिए।
किसान की जमीन और उसकी आजीविका दोनों महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि बिजली परियोजनाएं भी आगे बढ़ें और प्रभावित किसानों को उनके अधिकारों का उचित लाभ भी मिले। उत्तर प्रदेश में मुआवजा व्यवस्था में किया गया नया बदलाव इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, हालांकि पुराने मामलों और वास्तविक भुगतान की स्थिति को लेकर किसानों को संबंधित विभाग से अपने दस्तावेजों के आधार पर जानकारी लेना जरूरी होगा।