फिर बढ़ा ‘सुपर अल नीनो’ का खतरा, वैज्ञानिकों ने जताई चिंता

दुनियाभर में लगातार बढ़ती गर्मी और टूटते तापमान रिकॉर्ड के बीच वैज्ञानिकों ने एक बार फिर ‘सुपर अल नीनो’ को लेकर चिंता जताई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशांत महासागर में समुद्री तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो 1877 जैसे विनाशकारी हालात दोबारा पैदा हो सकते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, वर्ष 1877-78 का अल नीनो इतिहास की सबसे गंभीर जलवायु घटनाओं में गिना जाता है। उस समय वैश्विक स्तर पर भीषण सूखा, अकाल और भुखमरी फैली थी। अनुमान है कि उस आपदा में दुनिया भर में करीब 5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी, जिनमें भारत में एक करोड़ से अधिक लोग शामिल थे।
क्या होता है अल नीनो?
El Niño एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है, जो हर दो से सात साल के बीच विकसित होता है। इस दौरान प्रशांत महासागर के पानी का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है, जिससे दुनियाभर में मौसम का संतुलन बिगड़ सकता है।
जब समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से बहुत अधिक बढ़ जाता है, तो इसे आम बोलचाल में “सुपर अल नीनो” कहा जाता है। इससे सूखा, लू, भारी बारिश, बाढ़ और जंगलों में आग जैसी चरम मौसम घटनाएं बढ़ सकती हैं।
भारत पर सबसे ज्यादा असर की आशंका
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में मानसून पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। कमजोर मानसून की स्थिति में सूखा, जल संकट और कृषि उत्पादन में गिरावट जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
1877 की घटना के दौरान भारत सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में शामिल था। लंबे समय तक बारिश न होने से फसलें बर्बाद हो गई थीं और कई इलाकों में अकाल जैसे हालात बन गए थे।
वैज्ञानिकों ने क्या कहा?
Washington State University की एसोसिएट प्रोफेसर Deepti Singh ने चेतावनी दी है कि आने वाले वर्षों में कई साल तक सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। वहीं जलवायु वैज्ञानिक Katharine Hayhoe ने कहा कि इसका मानव समाज और जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आज दुनिया 19वीं सदी की तुलना में कहीं अधिक तैयार है। मौसम पूर्वानुमान, जलवायु निगरानी और आपदा प्रबंधन प्रणाली पहले से बेहतर होने के कारण 1877 जैसी भारी जनहानि की संभावना कम मानी जा रही है।